फोहलणिया/ पहेलियाँ

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में हिमाचल के जनजीवन में जम्मू -कश्मीर , पाकिस्तान के कुछ क्षेत्रों पंजाब के कुछ क्षेत्रों और उत्तरांचल के पहाड़ी क्षेत्रों की भाषा , संस्कृति एवं सभ्यता की छाप रही है क्यूंकि पहले ये इलाके एक ही थे
इसी तरह फोहलणी शब्द में भी पंजाबी के फ़ोलणा शब्द की झलक स्पष्ट रूप से देखने को मिलती है ,
“फ़ोलणा” यानि की ढूंढ़ना

समाज में परस्पर मानसिक स्तर और बौद्धिक विकास को परखने के लिए फोहलणीयां पूछने की परम्परा रही है , .फोहलणिया बुद्धि परीक्षा का सरल माध्यम रही हैं

किन्नौर में इसके लिए “फोहलणिया तथा बूझगे की कौथा” शब्दों का भी प्रचलन मिलता है
पहाड़ के लोग फोहलणी को मनोरंजन का बहुत बड़ा साधन मानते हैं , रात के समय चावलों के पराल की बनी बंदरी पर आग के आगे बैठ कर अथवा सर्दी की लम्बी राते बिताने के लिए फोहलणियों का मंच वयस्क -अवयस्क सभी के लिए समान रूप रहता है , इनका प्रयोग शास्त्रार्थ की भांति किया जाता है , फोहलणी में प्रस्तुत समस्या का यदि कोई समाधान अथवा उत्तर ना दे पाए तो फोहलणी पूछने वाला उससे कोई वस्तु पाने का वचन लेकर अगली फोहलणी पूछता है , इसमें मनोरंजन के साथ – साथ बच्चों को बौद्धिक विकास का वातावरण भी उपलब्ध होता है

विवाह के समय वर से छंद कहने का आग्रह भी उसकी बुद्धि परीक्षा का माध्यम था ,

हर जगह की अपनी भौगोलिक स्थिति रहन -सहन ,कृषि कार्य , खान- पान वेश-भूषा ,भाषा एवं संस्कृति होती है जिसका प्रभाव फोहलणीयों पर भी क्षेत्रानुसार रहा है इसलिए स्थानीय फोहलणीयों की विषय वस्तु लोकमास के जीवन का प्रतिबिम्ब प्रस्तुत करती हैं ,

सिरमौर क्षेत्र में एक फोहलणी इस प्रकार प्रचलित है
एक चिड़ी चडडगे दार ,
त्यों रे बच्चे नौ हज़ार

एक चिड़िया के विरले दार ,
परन्तु बच्चे नौ हज़ार

जवाब – अफीम का डोडा

इस फोहलणी में पोस्त की फसल का समग्र स्वरुप उभरता हुआ उसकी उत्पादन तथा मादक क्षमता का सीधा बोध करवाता है
पहाड़ों में यातायात दुर्गम रहा है नदियों पर पुल कम थे लोग नौका अथवा जानवरों की खालों के सहारे नदी पार किया करते थे नौका के विषय में एक फोहलणी इस प्रकार है

वणे च बड्डी , वणे च टुक्की ,वणे च कित्ता हार संगार
बारह बरहीयाँ जले च रेही , मुड़ी नी दिक्खे घर -वार

वन में काटी , वन में छांटी , वन में हुए हार श्रृंगार
बारह वर्ष जल में काटे , मुड़ ना देखे घर -बार

जवाब – बेड़ी , किश्ती , नौका

पहाड़ी जन जीवन स्थानीय स्तर की कृषि पर निर्भर रहा है जिसके लिए जानवरों की सहायता से फसल बिजाई आदि के काम किये जाते रहे हैं छोटे -छोटे अथवा सीढ़ीदार खेतों में बैलों आदि के सहारे खेतों में हल जोतने का काम किया जाता रहा है

इसी संदर्भ में एक कांगड़ी फोहलणी

टिक टिक टैंजो , धरत पुट्टैन्ज़ो
तिन्न मुंडियां , दस पैर चलैन्जो

जवाब – हल जोतता हुआ किसान

जैसे – जैसे वक़्त बदलता गया हिमाचल के लोग सेना में भर्ती हुए जब फौजी छुट्टी आते थे तो जैसा की पहाड़ों में अमूमन रात के समय ठंड ही रहती थी तो रात के समय गावं के लोग आग के सामने बैठ कर किस्से -कहानियाँ कहा सुना करते या फौजी के परिवार वाले जागरे (जगराते) आदि का आयोजन करते तो ऐसे में फौजियों के साथ फ़ौज के कम्बल भी पहाड़ी परिवेश में आए और कुछ-कुछ घरों में धान की पराल से बनी बंदरी या खजूर की बनी पंद का स्थान इन कम्बलों ने ले लिया
इन कंबलों की उपस्थिति के साथ बजूद में आई ये फोहलणी

ईटक-मिटक ,बड़ी का सिटक,
धोबी भी धोये , अपर गोरा ना होए

(बड़ी का सिटक यानि की बरगद के पेड़ का छिलका कहने का भाव ये कि ये कम्बल बरगद के छिलके के समान मोटा होता है )

पहाड़ी लोक चिंतन तथा मनोरंजन दैनिक आवश्यकताओं तथा उपयोगी वस्तुओं से जुड़ा रहा है घराट
(पनचक्की ) उसकी कला तथा योग्यता का प्रमाण है

धारा बाहियाँ काकड़ियाँ , पछवाड़ें जम्मी बेल,
जब्बरुए दी दाढ़ी पुट्टी , अंदर पेई खेल

जवाब – घराट (पनचक्की )

हिमाचली फोहलणीयों में यहाँ का जान -जीवन बोलता है , इनमें स्थानीय लोक चिंतन तथा लोक व्यवहार का बिम्ब मिलता है इसलिए लोक संस्कृति के सम्यक अध्यन के लिए इनका अध्यन एक आवश्यकता बन जाती है हालाँकि कुछ वरिष्ठ लेखकों ने लोक संस्कृति को सहेजने का प्रयास किया है लेकिन आज के आधुनकि दौर में उनके किये गए बेशकीमती कार्य को ब्रांडिंग की ज़रुरत है ताकि उनका किया कार्य आम जनमानस तक पहुँच सके , फोहलणी जैसे विषय पर डाक्टर गौतम शर्मा व्यथित ने भी लिखा है लेकिन आज ज़रुरत है तो उन जैसे बहुत वरिष्ठ लेखकों के किये गए काम को आधुनिक तरीके से आम जान मानस तक पहुंचाने की।

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