श्री कृष्ण जन्माष्टमी

समूचे भारत सहित श्री कृष्ण जन्माष्टमी
कांगड़ा जनपदीय क्षेत्र में भी बहुत हर्षोउल्लास से मनाई जाती है
हिमाचली कला – संस्कृति एवं संगीत में श्री कृष्ण का अपना एक अहम महत्त्व रहा है
जो की काँगड़ा कलम में गीत गोविन्द के माध्यम से भी देखने को मिलता है
इसी तरह गीत – संगीत के क्षेत्र में स्थानीय कांगड़ी भाषा में श्री कृष्ण जन्माष्टमी
को लेकर लिखी गयी एक रचना

काले महीने दियां न्हेरियाँ रातीं
जन्मेया कृसण मुरारी
मत दिंनदियां सेइयो गालीं
नी गरीबणी दा जाया …..

होरना दे घरे पंज-सत्त जाये
मेरा इक गिरधारी
नी मत दिंनदियां सेइयो गालीं
नी गरीबणी दा जाया —–

जां जमेया ताँ दीया बलेया
चौयीं पक्ख होई रियाँ लोई
नी गरीबणी दा जाया ….

पंज रुपईये मैं दाइया जो दिन्नियाँ
कुच्छड़ मिल्या ऍ माइया
नी गरीबणी दा जाया …..

भान , बतासा मैं गुड शक्कर दिन्नियाँ
सोने दी ऐ कटोरी
नी गरीबणी दा जाया ……।

चन्नण कट्टी पंघूड़ू घड़ानियाँ
रेसमी डोराँ ना लाईयां
नी गरीबणी दा जाया ……

औंदे ताँ जांदे बासुदेव झुटान्दे
औंदी ताँ जांदी देवकी झुटान्दी
झूटे देहण दाइयां
नी गरीबणी दा जाया ………………

भादो मॉस की अँधेरी राते
कृष्ण ने जन्म लिया
सखियो ! गाली मत देना , गरीबन का जाया है ।

औरों के घर पांच सात हैं , मेरा तो केवल गिरधारी ही है

जब यह जन्मा , दीपक जले
चारों और प्रकाश हो गया
पांच रूपए मैं दाई को देती हूँ
माँ को गोदी में बहलाने को बालक मिला है

सोने की कटोरी में बांटने के लिए मैं नकदी , बताशे , तथा गुड -शक्कर देती हूँ

चन्दन कटवा कर पंघूड़ा बनवाऊँ , उसे रेशमी डोरियों से सजाऊँ
आते आते बासुदेव झुलायें देवकी झुलायें
दाइयां-माईयां हिलोरे दे -दे कर खेलायें

Comments

comments

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: विषयवस्तु रक्षित है !!