टांकरी लिपि – श्री कृष्ण मुरारी

असाधारण व्यक्तित्व के स्वामी हमेशा साधारण दिखते हैं काँगड़ा जनपद के रैत गावं में जन्मे श्री कृष्ण मुरारी अपने आप में एक असाधारण व्यक्तित्व लिए हुए हैं , मुरारी जी कवि हैं लेखक हैं कला संस्कृति के सरंक्षक है , काव्य संग्रह , पहाड़ी भाषा में व्यंग बहुत कुछ लिखा इन्होने कांगड़ा घाटी की प्रसिद्ध लोककथा दिले राम की मनियारी को काव्य रूप में लिखा इस दौरान इनको हिम साहित्य परिषद मंडी के ज़ानिब पहाड़ी साहित्य सम्मान से अलंकृत किया जैमनी अकादमी ने इन्हें आचार्य की मानिंद उपाधि से सम्मानित किया गया पहाड़ी रियासतों की कभी अपनी भी लिखने की एक लिपि रही है जिसको टांकरी के नाम से जाना जाता है लेकिन अभी आधुनिकता की आपाधापी में हमारी ये लिपि लुप्त होने की कगार पर है कारण साफ़ और स्पष्ट है “हमारा हमारी हर तरह से समृद्ध -संप्पन भाषा संस्कृति परम्पराओं को लेकर दूसरों के सामने गर्व की बजाए शर्म महसूस करना ” आज जब हम आधुनिकता के इस दौर में अपनी भाषा तक बोलने में कतरा रहे हैं यह शख्स टांकरी लिपि को आने वाली पीढ़ियों के लिए सहेजने में लगा हुआ है कि शायद —

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