गायक प्रताप चंद शर्मा

” ठंडी -ठंडी हवा झुलदी ,
झुलदे चीलां दे डालू ,
जीणा काँगड़े दा “

धण गद्दियाँ दे धारा च फिरदे
सैला खबलू , फुलणू चुगदे ,
गद्दी दिक्खी-दिक्खी हस्सै
ओ बांका सजदा गद्धणी बालू
जीणा काँगड़े दा,
मर्द घरां दे बाहर कमांदे
छणकदे हथड़ू मंधाणीया घुमान्दे
भोला छान्बे-छान्बे पिय्ये ओ गोरिया हत्थै दई दिहालू
जीणा काँगड़े दा,

खाणै जो मिलदा भत्त भटुरू , उच्चियाँ धारां ते पौण छरुडु,
रिडियां-रिडियां डंगरेयां चारण , कनै गान्दे गीत गुआलु
जीणा काँगड़े दा,

घर -घर टिकलु घर -घर बिंदलु , बंकियां नारां छैल -छैल गभरु
सौगी – सौगी मेले जांदे गीतां गान्दे वही हंडोलू
जीणा काँगड़े दा ……………..

समूचे हिमाचल प्रदेश में लोकगीत बन चुके इस गीत को शायद ही किसी हिमाचली ने ना सुना हो
इस गीत को सभी गुनगुनाते हैं लेकिन बहुत ही कम लोग होंगे जो कि इस गीत के रचियता के बारे में जानते होंगे !

सुरीले गीतों को मधुर सुर देकर जन-जन तक पहुँचाने वाले लोक गायक प्रताप चंद शर्मा , खुद गीत लिखकर उन्हें इकतारे के साथ गा गाकर इतना प्रसिद्ध किया कि ये गीत आज की तारीख में लोकगीत बन गए हैं , कांगड़ा जनपद के लोकगीतों की परम्परा में इनके गाए गीत बहुत ही प्रसिद्ध एवं लोकप्रिय हैं इनके गीतों में कांगड़ा घाटी की सुंदरता , लोकजीवन , परम्पराओं का जीता -जागता वर्णन मिलता है ,

सांभ के अंतर्गत पिछले दिनों प्रताप चंद शर्मा से मिलने का मौक़ा मिला ज़िन्दगी के 88 सावन देख चुके प्रताप चंद शर्मा का जन्म 23 जनवरी 1927 को पंडित झाणू राम एवं माता श्रीमती कालो देवी के घर यानि धरोहर गावं गरली- परागपुर के पास लगते गावं नलेटी तहसील देहरा जिला कांगड़ा हिमाचल प्रदेश में हुआ , चौदह वर्ष की उम्र में विवाह संस्कार में बंध गए , इनके पिता जी की गीत -संगीत में गहन रूचि थी वे कथा -कीर्तनो में धार्मिक गीत और लोकगीत गाते थे इसलिए घर पर ही मिले संगीतमय वातावरण से प्रताप चंद शर्मा जी को संगीत की प्रेरणा मिली , छोटी सी उम्र में विवाह की बजह से चार लड़कों एवं तीन लड़कियों के पालन पोषण की ज़िम्मेवारी सर पर पड़ गयी इसलिए बेरोजगारी सबसे बड़ी समस्या रही 1961 में माता गुजर गयी फिर रहने वाला घर भी गिर गया , मजदूरी करके जीवन यापन होता रहा लेकिन इनके अंदर का कलाकार विपरीत परिस्थितियों में भी और ज्यादा परिपक्व होता गया ,1962 में दुर्गादत्त शास्त्री , विद्यालंकार , सुशील चन्द्र रत्न के सहयोग से लोक संम्पर्क विभाग कांगड़ा की संगीत पार्टी में काम मिला इस जत्थे के लीडर संगीताचार्य मास्टर शाम सुन्दर थे डी पी आर ओ प्रोफेसर चंदरवरकर के आग्रह से पहला गीत ” ठंडी -ठंडी हवा झुलदी ,झुलदे चीलां दे डालू ,जीणा काँगड़े दा ” प्रताप चंद शर्मा ने लिखा ,

इसके अलावा इनका और गीत ” जे तू चल्ला नेफा नौकरी , मेरे गले दे हारे लैंदा जायां ” भी आज लोकगीत के रूप में ही गाया जाता है

प्रताप चंद शर्मा का प्रिय वाद्य यंत्र इक तारा है जिसे स्थानीय भाषा में धंतारु भी कहते है
बकौल प्रताप चंद शर्मा स्थानीय लोग उन्हें ध्नतारुए वाला कहते हैं जहाँ कहीं भी कोई मिलता यही कहता ” अरा प्रतापुआ किसी गीते दा टक्क ताँ सुणादा जा ” वाह-वाह तो सब जगह मिलती और साथ में ये शब्द भी ” अरा प्रतापुआ मज़ा आई गेआ ” इसके अलावा कुछ नहीं …

चार बैटों और तीन लड़कियों वाले परिवार के पालन पोषण को नौकरी में वेतन
बहुत कम मिलता रहा बड़ी मुश्किल से गुजरता रहा जीवन …

लोक कलाओं को जीवंत बनाये रखने के लिए लोक कलाकारों को प्रोत्साहन देना बहुत ही ज़रूरी है

साभार -हिमसुमन , प्रताप चंद शर्मा

Comments

comments

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: विषयवस्तु रक्षित है !!