अलफ दीन

नाम अलफ दीन और उम्र का सिर्फ अंदाज़ा ही लगाया जा सकता है
इस बात से कि इस बुजुर्ग की आँखें आज भी उनीस सौ सैंतालीस से लेकर बंटवारे तक की सब सियासी घटनाओं की चश्मदीद गवाह हैं
नूरपुर से राजा का तालाब की तरफ का गावं सुखार जिसमें खड्डियों पर शॉलें बुन कर अपने परिवार का जीवन यापन करने वाले कुछ लोग आज भी रहते हैं जिन्हें कुछ लोग मुसलमान कहते हैं

अलफ दीन नुरपुरी शाल के जवानी के दौर की उन शख्सियतों में से इक मात्र ज़िंदा बचे वो शख्स हैं जिन्होंने नूरपुरी शाल और नूरपुर में बनने वाले कपडे को इक अलग पहचान दी । लेकिन कहीं किसी दस्तावेज में इनका नाम नहीं . शायद ये सिर्फ ता-उम्र कारीगर बन कर रहे …. मैनेजर नहीं !!

” सीना गर्व से फूल जाता था जब किसी को हमारे हाथ से बना हुआ कपडा पहने हुए देखते थे एकदम से पहचान लेते थे कि ये कपडा हमने बुना है “

बकौल अलफ दीन इक वक़्त था जब दूर- दूर तक उनके बनाए कपडे की भरपूर मांग थी और खूब फल फूल रहा था इनका कपडा बुनने का काम लेकिन अचानक सोसायटीज ना जाने कहाँ से आई और इन हथकरघा सोसायटीज ने आधुनिक मशीने लगा कर आस पास के कारीगरों को काम पर लगा लिया , खड्डियॉँ घरो में रह गयी और कारीगर मशीनो पर काम करने लगे जहाँ पहले सीधे बंगाल से रेशम मंगा कर या कपास के सूत से कपड़ा बनाया जाता था वहीँ अब कपडे में सिंथेटिक इस्तेमाल होने लग पड़ा . मशीने लगा कपडा बनवाने वाले व्यापारियों ने इक समय तक तो खूब पैसा कूटा …इनके हालात भी आज सबके सामने है लोग अभी भी शुद्ध और हाथ से बना कपड़ा चाहते हैं लेकिन ना ही शुद्ध रा मैटेरियल मिल पाता है और ना ही आज के कारीगर इतनी मेहनत करना चाहते हैं
खैर जनाब हमने इस उम्र में भी खड्डी नहीं छोड़ी पहले सूती और रेशमी कपडे बनाते थे आज खड्डी पर लोगों के घरों से पुरानी स्वेटर्स से ऊन उधेड़ कर चादरें बनानी पड़ती हैं इक चादर को बनाने में तीन दिन लगते हैं और कीमत मिल पाती है नब्बे रुपये लगभग तीस रुपय दिहाड़ी पड़ती है इक चादर को बनाने के बाद
खैर हम दोनों मियां बीवी रहते हैं धन्यवाद करते हैं सरकारों का जिन्होंने हमें सिर्फ ज़िंदा ही रखने लायक पांच सौ रुपये पेंशन लगा रखी है …जनाब इस घर में सिर्फ हम मियाँ -बीवी ही बुजुर्ग नहीं हैं बल्कि हम दोनों को संभाले हुए ये “घर” हमसे भी बुजुर्ग है

अलफ दीन जी से ये पूछे जाने पर कि
इतनी मुफलिसी में घर का राशन कहाँ से आता जबकि बतौर पेंशन मिलने वाले पांच सौ रुपये तो दवाई पर ही खर्च हो जाते हैं
तो जवाब मिला – “बच्चा जेहड़ा राशन साकि डिपुएं मिलदा सै केहो जेहा होन्दा तुआकि पता ही होणा टिड्ड ताँ भरोई जाँदा अपर ऐहो-जेहा आटा- चौल जेहड़ा अन्तो (आई आर डी पी ) विच मिलदा उस्सकी की खाई की कोई भी बुमार होई जाए …ज्यादा कर के अहीँ पचायी ही लैने अपर हुण इस उम्र विच कोहे पचदा ए …
भला होए सरकार दा जेह्ड़ी दवाई अस्सर पंज सौ देयी दिंदी साकि “

इनके कहने का मतलब कि बेटा जो राशन हमें डिपू में मिलता है वो कैसा होता है तुम्हें पता ही होगा पेट तो भर जाता है लेकिन ऐसा आटा-चावल जो कि अन्तो के तहत आता है उसको खा कर कोई भी बीमार हो जाए … ज्यादातर हम पचा ही लेते थे लेकिन इस उम्र में कहाँ पचेगा भला हो सरकार का जो दवाई खरीदने लायक पांच सौ रुपये दे देती है

वो कारीगर जिनके हुनर के माध्यम से हिमाचली उत्पादों ने अपनी अलग पहचान बनाई … और वो कारीगर आज मुफलिसी की गुमनाम ज़िन्दगी व्यतीत कर रहे हैं … … …

लगभग हर क्षेत्र के वास्तविक कलाकार मुफलिसी में जीवन बिता रहे हैं और उन कलाकारों के समकालीन लोग जो कलाकार कम और मैनेजर ज्यादा थे आज सपरिवार खूब लहलहा रहे हैं …

……… दुखद एवं विचारणीय है

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