हमारे पहने कपड़ों की पावर

(ये लेख नेता के कपड़ों ना कार्पोरेट के कपड़ों के बारे में नहीं है),
हैरानी हुई ना ?
जी हाँ पर यहाँ हमारा मतलब उस पावर (ऊर्जा) से है जो उनको बनाने में लगी जैसे कपास उगाने में किसान की मेहनत, पानी, मशीन (बिजली) ,खननं, कैमिकल्ज़ , डायीज़ (रंग) जिनको बनाने में भी बिजली पानी, तथा लेबर ! क्या हमें पता है कि जो भी लिबास हम पहनते हैं कोई ना कोई दरिया, नहर पानी , ज़मीन का टुकडा उससे प्रदूषित होता ही होता है ! वैसे ही कि जैसे शराब बनाने वाली डिस्टिलरी अपने आसपास के हज़ारों एकड़ ज़मीन को ज़हरीला बना देती है ! चलो देखें और पड्तालें :
शर्ट या पैंट रिंकल -प्रूफ (ज्यादा ऊर्जा),
हमारी शर्ट या पैंट लैस-इन्फ्लेमेब्ल (आग नहीं पकड़ेगी, ज्यादा ऊर्जा),
तो मान लेना होगा कि उस कपडे में कार्सिनोजेनिक कैमिकल्ज़ हैं (cancerous), जो बच्चों को उनकी चमड़ी को एलर्जी तो देंगे ही देंगे !
कपड़ा बनता कैसे है? खेतों में कपास , एक किलो कपास पाने के लिए दस हज़ार लिटर से भी ज्यादा पानी चाहिए होता है ! कपास फिर इकठा कर बेल्ज (बोरियों में) भरी जाती उनको ट्रकों में , रेल-गाड़ियों में कारखानों तक यानी पेट्रोल और डीजल पर ये सब आपको पता है ! फिर उनकी जिन्निंग , कार्डिंग, क्लीनिंग, डाईंग, पैकेजिंग सभी प्रोससिज़ होते जिनमे भारी मात्रा में बिजली, साफ़ पानी इस्तेमाल होते हैं और ये साफ़ पानी प्रदूषित होने पर ज़मीन में छोड़ दिया जाता , पृथ्वी को और भी प्रदूषित करता!
खैर…… फैक्ट्रियां जहां ये कपडे बनते हैं, पीने वाले साफ पानी का भारी मात्रा में इस्तेमाल करती हैं ( एक डेनिम पैंट जिसका वज़न सिर्फ 400 ग्राम होता है 6000 लीटर पानी लेती है) ! डिजाईनदार कपड़ों में तो और भी ज़हरीले अम्ल , तेज़ाबी कोम्पाऊँड डाले जाते हैं जो आपकी वाशिंग मशीन, घर में आ जाते हैं ! और फिर एक सिलसिला शुरू हो जाता है, हवा में ख़ास तरह की गैसिज़ छोड़ते हैं , पानी से कपडे धोकर आप उसे हैवी करके ज़मीन में बहा देते हैं ….याद रहे कि हम अपने पहने हुए कपड़ों कि पावर कि बात कर रहे हैं ! करोड़ों कपडे इस देश में ही रोजाना धुलते हैं …तो अरबों लिटर पानी जाता ही जाता होगा जो धुलाई में हैवी हो गया ज़मीन में छोड़ दिया गया !
जो पीने योग्य होता है……
धागा भी जो बनता है कपड़ा बनाने के लिए, फिर उस धागे को किसी प्लास्टिक पन्नी में पैकेज भी किया जाता होगा …. नहीं क्या ?
उसपर भी अनेक ऊर्जाएं लगीं !
फिर फैक्ट्री अपने माल को ट्रकों में डाल कर कही भेजती भी होगी , एक शहर से दुसरे शहर, वो पेकेट रेलगाड़ी पर भी जाते होंगे , यानी ऊर्जा ही ऊर्जा ( बिजली, कोयेला , खननं , ज़मीन का दोहन ….नहीं क्या )?
तो हमारी ड्रेस ग्लोबल वार्मिंग , ग्रीन हॉउस गैसों प्रदूषण के साथ सीधे जुडी कि नहीं ?
तो फिर ऐसी भयानक परिस्तिथि में किया क्या जाए…नंगे रहें ??
ना , ना !
हम सूती, खादी या ग्रामीण स्तर पर भेड़ बकरियों की ऊन बनने वाले वस्त्र अपना सकते हैं जो बिजली कि मशीनों पे नहीं बनते ,
कपास उगनी है और इतने भर पानी से साफ़-सूफ हो कर सीधे जुलाहे / बुनकर के घर या ग्रामीण को-ओपेरेटिव में जानी है …जहाँ हाथ से चलने वाली खड्डी (हैण्ड लूम्ज़/ हाथ-करघे) लगी होती हैं जहाँ बिजली की भारी खपत नहीं होती
जहां छोटे मोटे कबीर जी होते हैं हमारे गद्दी भाई होते हैं उनकी बहनें बच्चे ,
जहाँ पानी लाखों लिटर प्रति दिन वेस्ट नहीं होता …हथकरघा उद्योग, गरीब जुलाहों , गद्दी परिवारों को भी रोज़गार मिलता है!
इतना भर तो हम कर सकते हैं जो हमारे बस है ! हम अगर ये कर पाते हैं तो हम पानी बिजली बचा सकते हैं , प्लास्टिक के इस्तेमाल को कम कर सकते हैं ! सिर्फ हमें एक अच्छी सौम्य सहज चॉयस भर करनी है … हम ये भी कर सकते हैं , दोस्तों, रिश्तेदारों के जन्मदिन या अन्य उपलक्ष पर उनको हिमाचल के जनजातीय क्षेत्रों में स्थानीय स्तर पर्यावरण को बिना नुक्सान पहुंचाए तैयार किये गए वस्त्र गिफ्ट करें ऐसा करने से इक तो इन शुद्ध कपड़ों की ब्रांडिंग होगी और इनको तैयार करने वाले हिमाचल वासी भी आर्थिक रूप से सदृढ़ होंगे ,विडंबना ये है क़ि प्राकृतिक संसाधनो से तैयार वस्त्रों की उपलब्धता आज नाम मात्र है .

! बाकी आपकी मर्ज़ी !
हमारी पृथ्वी के पास लाखों साल हैं वो तो रहेगी ही रहेगी ,
गंजी और रुण्ड मुंड,
पर हमारे पास बमुश्किल सौ दो सौ साल भी नहीं …….मानें ना मानें ….

साभार
अर्नेस्ट अल्बर्ट

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