घुरेही

गद्दी जनजाति के मनमोहक नृत्य , घुरेही और डंडारस , घुरेही नृत्य में सिर्फ महिलाएं नाचती हैं और डंडारस में सिर्फ पुरुष , घुरेही को डन्गी भी कहते हैं जबकि डंडारस नृत्य ताल पर आधारित है , घुरेही नृत्य में नाचने वाली महिलाएं साथ -साथ गाती भी हैं ,
गद्धी लोग हर वर्ष सर्दियों में अपने मूल स्थान भरमौर ( गद्धेरण ) से काँगड़ा (जांदर) आदि निचले क्षेत्रों में उतर आते हैं चैत्र महीने में महारानी सूही की बलिदान स्मृति में मनाये जाने वाले मेले के अवसर पर ये लोग चम्बा पहुँच जाते हैं , गद्धी महिलाएं सूही मेले में घुरेही नृत्य करती हैं यूँ कह सकते हैं अपने घर में पुनः प्रवेश के उल्लास में किये जाने वाले इस नृत्य का आधार गृह प्रवेश है
गृह प्रवेश शब्द ही गृह प्रवेशी के रूप में घुरेही बन गया , एक मान्यता यूँ भी है कि इस नृत्य में महिलाओं की घूर्ण प्रक्रिया अर्थात नृत्य में गोल चक्कर लगाने का आकर्षक एवं विशिष्ठ प्रकार का होता है , घूर्ण शब्द में “ई” प्रत्यय के योग से घूर्णायी और बाद में ध्व्न्यान्तर से घुरेही या घुरेई शब्द बना , एक अन्य मान्यता जो भी घुरेही शब्द की उत्पति को दर्शाती है कि ये नृत्य महिलाएं अपने घर यानि अपनी क्षेत्रीय परिधियों में करती हैं इसलिए “ घरे री” घरेई और फिर घुरेही बन गया , घुरेही नृत्य में गद्धी महिलाएं लुआन्चडी और उसके अंदर कमीज , पाजामी और सर पर चादरु पहनती हैं , चौक , लॉन्ग , डोडमाला , टीका ,कर्णफूल इनके प्रमुख आभूषण होते हैं , वास्तव में घुरेही नृत्य घुरेही गीत की लय के आधार पर बिना वाद्य यंत्रो के होता था लेकिन अब इसमें नगाड़ा , शहनाई तथा ढोल भी प्रयोग किया जाता है ,

चम्बा नगर के पीछे शाह मदार की पहाड़ी के बीच रानी सूही (सुनयना) के मंदिर स्थल पर मनाये जाने वाले मेले में महिलाएं पारम्परिक चम्बियाली वेशभूषा में घुरेही नृत्य करती हैं मेले की आखरी रात “सुकरात “ के नाम से जानी जाती है जनश्रुति के अनुसार सुकरात का मतलब सुख की रात या शोक की रात बतलाया जाता है अधिक सम्भावना यही है कि “सुकरात” शोक रात का ही परिवर्तित रूप है , “श” का “ स” में परिवर्तन होना चम्बियाली की सामान्य प्रवृति है , इसके अलावा “उ” स्वर के “ओ” में परिवर्तित होने पर “शोकरात” का सुकरात बना है सुकरात में प्रचलित लोकगीत की पंक्तियों से भी यह शोक की रात ही प्रतीत होती दिखती है लगभग हज़ार वर्ष पहले रानी सुनयना का प्रजा की पेयजल समस्या को दूर करने के लिए दिए गए बलिदान के बाद यूँ भी कह सकते हैं कि रानी सुनयना के बलिदान के दिन के बाद से प्रजा को पानी का तो मिल गया जो कि सुख का विषय रहा लेकिन ऐसी रानी जिसने प्रजा के लिए अपना बलिदान तक दे दिया ऐसी रानी को खो देना यकीनन शोक की बात कही जा सकती है
सुकरात कुडियो चिडियों , सुकरात देवी रे देहरे हो
ठंडा पाणी किहाँ करी पीणा हो ,तेरे नैणा हेरी-हेरी जीणा हो,
सुकरात कुडियो चिडियों , सुकरात नौणा पणीहारे हो
ठंडा पाणी किहाँ करी पीणा हो ,तेरे नैणा हेरी-हेरी जीणा हो,
सुकरात कुडियो चिडियों , सुकरात राजे दे बेह्ड़े हो
ठंडा पाणी किहाँ करी पीणा हो ,तेरे नैणा हेरी-हेरी जीणा हो,
रंग लाल कुडुआ तेरा हो रंग लाल चिडआ तेरा हो
ठंडा पाणी किहाँ करी पीणा हो ,तेरे नैणा हेरी-हेरी जीणा हो,

हर वर्ष चैत्र माह के अंतिम दिन चम्बा के साथ शाह मदार की पहाड़ी पर सूही मंदिर में उक्त पंक्तियाँ स्वरबद्ध हो जब चम्बा की हवाओं में गूंजती हैं तो समस्त वातावरण रानी सुनयना के चम्बा नगर की जल आपूर्ति के लिए दिए बलिदान को याद करते हुए करुणामय हो उठता है
गीत संगीत में गद्दी जनजाति किसी से भी पीछे नहीं रही है , यहाँ के लोकगीत जनमानस के जीवन के हर पहलू को सपर्श करते हैं , इनसे निकली अभिव्यक्ति बहुत ही हृदयग्राही होती है
“ पठरा बठोरेया हेडिया सिकारिया
ऐसा हरणी जो मत मारे हो “
यानि कि हिरणी के शिकार के लिए घात लगाये बैठे शिकारी इस हिरणी को मत मारना इस हिरणी का मांस खाना निषेध है क्यूंकि इसका पैर भारी है अर्थात ये गर्भ से है ,
इस प्रकार अनेक लोक गीत घुरेही नृत्य के साथ –साथ गाये जाते हैं जैसे “ आया बसोआ माये लगियां सूहीयाँ , सुकरात कुडियो चिडियों , गुडक चमक भहुआ मेघा हो ,

चित्र – पूजा शर्मा
साभार –विद्याचंद ठाकुर , नरेंदर अरुण (सुनयना)

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