Star of the book : Tshering Dorje

17 जुलाई 1972 , तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने एक पुस्तक के लिए अंग्रेजी भाषा में परिचयात्मक टिप्पणी लिखी। जिसकी प्रथम पंक्ति कुछ इस प्रकार थी : दूर-दराज़ के क्षेत्रों में एक विलक्षण आभा होती है, विशेषकर तब; जब वहां पहुंचना थोड़ा कठिन हो। यह टिप्पणी उन्होंने मनोहर सिंह गिल की पुस्तक हिमालयन वंडरलैंड, ट्रेवल्स इन लाहुल एंड स्पीति के बारे में की थी। कुछ वर्षों पहले तक इस पुस्तक के बारे में अधिक लोग नहीं जानते थे। अब सम्भवतः बहुत से लोग जानते हैं। मनोहर सिंह गिल ने पुस्तक में लाहौल स्पीति के हर उस पहलू के बारे में लिखने का प्रयास किया है, जो वहां अधिकारी रहते हुए उन्होंने अपने कार्यकाल में देखा या अनुभव किया।

इस पुस्तक में गिल साहब एक नाम बबारम्बार लेते हैं। वह नाम है , छेरिंग दोरजे। बेशक दूसरों के लिए यह सिर्फ एक नाम हो सकता है, एक व्यक्तित्व का संबोधन, या उस पुस्तक में वर्णित एक पात्र, जिसने मनोहर सिंह गिल को उनके ड्राइवर फौजा सिंह के साथ लाहौल का दीदार करवाया। पर आपको बताते चलें कि यह कोई नाम भर नहीं, बल्कि नाम से बढ़कर एक आला शख्सियत हैं। आप यह मान सकते हैं कि छेरिंग दोरजे हिमालय के इस पश्चिमी भाग का जीते जागते एनसाइक्लोपीडिया है।

31 जनवरी 2018 को जब पहली बार इनके घर जाना हुआ था तो उस दिन गिल साहब की इस किताब से जुड़ी कुछ यादें साक्षात अनुभव करने का मौका मिला था। पहाड़ों के बारे में, कुल्लू के बारे में, लाहौल के बारे में, खासकर हिमालय के लगभग हर हिस्से के बारे में जब आप छेरिंग दोरजे से नित नए कथानक और नई जानकारियों के बारे में सुनते हैं, तो आपको स्वतः समझ आ जाता है कि क्यों मनोहर सिंह गिल ने उन्हें अपनी पुस्तक में यह उद्बोधन दिया : Star Of This Book

वो दौर जब मनोहर सिंह गिल लाहौल में रहे और इस पुस्तक के लिए सामग्री इकट्ठा करने का काम किया, छेरिंग दोरजे उनकी जानकारियों के मूल स्त्रोत रहे। इसी दौरान उनकी मित्रता प्रगाढ़ हुई और लाहौल से वापिस आने के बाद भी गिल साहब और छेरिंग दोरजे जी लगातार सम्पर्क में रहे।

जब उनसे इस पुस्तक के बारे में पूछा तो वे हंसते हुए बड़ी विनम्रता से बताने लगे ; कैसे वे और गिल साहब आज भी हर 3-4 दिन में फोन पर बात करते हैं।

छेरिंग दोरजे जी वो शख्स हैं जिनका सम्पर्क इतिहास के कुछ बेहतरीन यात्रियों और लोगों के साथ रहा है। मनोहर सिंग गिल जी की किताब पर इनसे बात करते हुए महापंडित राहुल सांकृत्यायन का ज़िक्र हुआ। उनके बारे में इन्होंने बस इतना कहा कि इनके पिता जी के साथ राहुल जी कुछ समय सम्पर्क में रहे हैं।

पेनेलोप चेटवुड हो, रोरिख परिवार हो, विशेषकर निकोलाई रोरिख के पुत्र जॉर्ज रोरिख से उनकी मित्रता हो, ट्रेवल राइटर और फोटोग्राफर क्रिस्टीना नोबल हों या कोई और, लाहौल-स्पीति में रुचि रखने वाले ट्रेवल राइटर्स छेरिंग दोरजे जी के सम्पर्क में कभी ना कभी ज़रूर रहे हैं।

आज हम जिस रोहतांग सुरंग को भी देख रहे हैं, उसके लिए शुरुआती प्रयास करने वाले दो लोगों में से एक छेरिंग दोरजे रहे हैं।

तिब्बत से यारकंद तक, 200 से अधिक बार जो शख्स हिमालय के इन दर्रों को अपने कदमों से नाप चुका हो, उसके यायावर होने की कल्पना सहज की जा सकती है। शायद यह भी एक कारण रहा होगा कि मनोहर सिंह गिल जी और अन्य शख्सीयतों ने इनका महत्व समझा था। हम उन भाग्यशाली लोगों में से हैं जिन्हें छेरिंग दोरजे जी से मिलने और उनसे सीखने का मौका मिला। हिमालय और हिमालय की परम्पराओं को लेकर आज थोड़ा बहुत जो अलग व तार्किक दृष्टिकोण देखने को मिलता, बहुत कुछ शायद उनकी ही देन है। किताब की टिप्पणी में इंदिरा जी का एक कथन था, जो उन्होंने ग्रामीण परिवेश वाले दूर दराज़ के क्षेत्रों के लिए कहा था : “दूर दराज़ के क्षेत्र से अलौकिक आभा वाले ऐसे व्यक्तित्व भी सामने आए हैं”

जैसे यह कथन छेरिंग दोरजे जी जैसे ग्रामीण परिवेश से निकली प्रतिभाओं, उनकी समकालीन अन्य प्रतिभाओं और उनकी अगली पीढ़ी के ही था। छेरिंग दोरजे ना होते तो आज हिमालयन वंडरलैंड नामक किताब भी ना होती, अगर होती भी तो वैसी नहीं होती जैसी बन पाई। ऐसे ही इस किताब के पन्नों की तरह बहुत से वे लोग भी आज उस मुकाम तक ना पहुंच पाते, जहां वे आज सिर्फ इसलिए हैं , क्योंकि गुसख़्यार के एक लड़के ने अपने तार्किक शोध और सापेक्ष मूल्यांकन से पिछले 50 वर्षों में हिमालय की परम्पराओं को देखने का एक नया दृष्टिकोण हम सबको दिया है।

उन्होंने हमे बताया है कि हिमालय के देवी-देवता, यहां की परंपराएं, यहां की वास्तविकता को अगर जानना है तो उन सभी घटनाओं और प्रामाणिक तथ्यों को ध्यान में रखना होगा, जो इस क्षेत्र के साथ कालांतर में निरन्तर घटित हुई या शोधार्थियों द्वारा विभिन्न समयों पर खोजी गई हैं।

एक दिन उन्होंने बातचीत में कहा था : कपोल कल्पनाओं के इर्द गिर्द बुना गया इतिहास बेशक आपको कुछ क्षणों के लिए गौरवान्वित महसूस करवा सकता है, परंतु उसे इतिहास के रूप में मजबूती से कभी स्थापित नहीं कर सकता। हिमाचल के इतिहास को कभी ना कभी दंतकथाओं से आगे निकलना ही होगा।

चित्र में सबसे आगे : छेरिंग दोरजे जी रोथङ-ला (रोहतांग/रटांग) पर
चित्र में छेरिंग दोरजे जी अपने कुल्लू स्थित घर पर

Comments

comments

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *