जोत, जोगणियां और पर्यटन

पहाड़ी बोली में जोत का अर्थ किसी पहाड़ की चोटी से होता है। वैसे कुलुवी बोली में ज़ोत – शिखर को और ज़ोथ – चंद्रमा को कहते हैं। पर यहां बात केवल जोत की, हमारे पहाड़ की चोटीयों की, उनसे जुड़ी हमारी आस्था की, जहां हमारी जोगणियां निवास करती हैं।

हिमाचल के लगभग सभी क्षेत्रों, विशेषकर कुल्लू, मंडी, लाहौल में पहाड़ की चोटियों पर एक विशेष समूह की देवियों का वास रहता है, जिन्हें हम स्थानीय बोली में जोगणियां कहते हैं। जोगणियों के बारे में हमे एक मत 64 योगनियों का भी मिलता है। बेशक वह अलग मान्यता है, पर है इन्ही से जुड़ी हुई। अमूमन हर दूसरी चोटी पर ये जोगणियां आपको मिल जाती हैं।

हिमाचल में जोगणियां अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग नाम लिए रहती हैं। जैसे कुल्लू में इनमें से कुछ जोगणियों को आछरी भी कहा जाता है। यही नाम उत्तराखंड में वहां के पर्वतों की चोटी पर विद्यमान अप्सराओं के लिए प्रयोग किया जाता है। यथा, उत्तराखंड का खैटखाल पर्वत इसका उदाहरण है।

यहां पहाड़ी लोग जोगणियों के इन स्थानों को बेहद पवित्र मानते हैं। इनकी पूजा का विधान आम पूजन विधानों से कुछ अलग रहता है। यहां किसी प्रकार का शोर-शराबा करना, पिकनिक मनाना या देवप्रथा के अलावा किसी तरह की कोई अन्य गतिविधि को अंजाम देना भी निषेध रहता है। इसके साथ यहां तम्बाकू, शराब व चिकन भी निषेध माना जाता है। हां, हमारी कबाइली प्रथा के अनुसार अज-बलि का विधान विशेष परिस्थिति में यहां अवश्य होता है, परंतु विशेष परिस्थिति में।

ख़ैर, पिछले कुछ दिनों से चर्चा का एक विषय बारंबार सामने आ रहा है। कुल्लू क्षेत्र की लगघाटी में पर्यटन का विकास कैसे हो ? यह विषय सरकार के संज्ञान में भी है और इस घाटी को पर्यटन के दृष्टिकोण से विकसित करने के लिए स्थानीय लोग भी बहुत उत्साहित दिखते हैं। कई स्थलों को चिन्हित करने का काम आरम्भ हो चुका है। निःसन्देह पर्यटन स्थल विकसित होने से यहां रोज़गार की संभावनाएं बहुत बढ़ जाएंगी।

पर यहां समस्या एक और भी है। जितने स्थान पर्यटन स्थलों के रूप में विकसित करने की बात चली है, उनमें से बहुत से ऐसे स्थान हैं, जो या तो पहाड़ की इन जोगणियों के स्थान हैं, या उनके स्थान से होकर आगे किसी स्थल की ओर सड़क मार्ग प्रस्तावित है। सभी जानते हैं कि हमारे यहां निर्माण के तरीके और विकास के मायने क्या हैं। तो उसे ध्यान में रखते हुए बहुत सम्भव है कि भविष्य में निर्माण के नाम पर इन पवित्र स्थलों से व्यापक छेड़छाड़ होगी और इनके स्वरूप को बदलने में कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखी जाएगी। यदि ऐसा हुआ तो परिणामस्वरूप आंतरिक हिमालय की एक और विशेष मान्यता का ह्रास हमारे सामने मुंह बाए खड़ा होगा।

एक ओर इन स्थानों का महत्व सरकार में बैठे लोग शायद जानते ही नहीं। वहीं दूसरी ओर जो सरकार में बैठकर भी इन स्थानों का सांस्कृतिक व सामाजिक महत्व जानते हैं, वे अक्सर ऐसे मामलों में एक अबूझ सी चुप्पी धारण कर जाते हैं।

कुल्लू की बात करें तो हमारे देवी-देवताओं से संबंधित एक प्रथा व मान्यता है कि जोगणियों के इन्ही स्थानों पर जाकर उन्हें पूरे वर्ष के लिए शक्ति मिलती है और वे जन कल्याण का कार्य कर पाते हैं। परंतु प्रश्न यह कि पर्यटन को लगने वाले पंख से इस स्थलों की शांत प्राकृतिक संरचना बिगड़ने पर दैवीय मान्यताओं और लोक-रीतियों का जो ह्रास होगा क्या हम उसकी भरपाई किसी भी रूप में कर पाएंगे ? शायद नहीं …

पर्यटकों और आधुनिक पीढ़ी के एजुकेटेड लोगों के लिए तो पहाड़ों की चोटियां केवल पिकनिक स्थल हैं। पर्यटन स्थल विकसित होने पर वे यहां आएंगे, मौज मस्ती करेंगे और चले जाएंगे। परंतु लोक समाज की आस्था जिस प्रकार खंडित होगी उसका क्या ?

सुनने में आया कि पिछले दिनों लग घाटी के मठासौर नामक स्थल पर कुछ युवा पिकनिक मनाने गए। जहां बीच में कुपड़ी नामक जगह की सोलह सुरगणियों / जोगणियों का पवित्र स्थान पड़ता है। उसके बाद वहां मौज मस्ती हुई और वे लोग वापिस भी आ गए। हो सकता है उन्होंने यह सब अनजाने में किया हो। पर्यटक भी तो अनजाने में ही करेंगे। कोई जानबूझकर देवस्थलों को गंदा तो करेगा नहीं!

अतः यह माना जा सकता है कि युवाओं ने भी किसी बुरी मंशा से ऐसा नहीं किया होगा। पर उसके बाद साथ के गांवों में जोगणियों और देवताओं ने अपने शामन्स/ओरेकल्स के माध्यम से इस घटना पर नाराज़गी व्यक्त करते हुए अपने पवित्र स्थल पर गंदगी फैलने की बात कही। साथ ही गंभीर परिणाम भुगतने की चेतावनी भी दी। बेशक कुछ लोग इसे अंधविश्वास की उपमा दें, पर हम पहाड़ियों का इसी प्रकार की रीतियों से राबता रहा है तो हमारे लिए यह हमारी गंभीर आस्था का विषय है।

यह घटना तो हो गई, चिंता की बात आगे यह है कि वही पवित्र स्थल निकट भविष्य में काईसधार नामक स्थान से होकर मठासौर को जोड़ने वाले मार्ग के बीच पड़ेगा। अर्थात वहां निर्माण भी होगा, लोग भी रुकेंगे, पिकनिक भी मनेगी और कचरा भी फैलेगा। सभी घुमक्कड़ों के मन में पहाड़ी देवताओं के लिए आस्था रहेगी, यह भी वस्तुतः असम्भव सी बात है। इसलिए जितना जल्दी हो सके हमे यह समझना होगा कि अपने देवस्थलों की बलि देकर पर्यटन में विकास की सम्भावनाएँ ढूंढना हमारे लिए कोई बुद्धिमानी का निर्णय नहीं है।

हमें पर्यटन स्थलों को विकसित करने के लिए अन्य वैकल्पिक मार्ग और स्थल खोजने होंगे, जहां पर्यटक गतिविधियों पर पहाड़ के देवी-देवताओं को आपत्ति ना हो। जैसे दरपौइण से नीचे लगती पहाड़ी में देवधार से लेकर काली ढुघ तक बुरांस के पेड़ों का सुंदर गार्डन तैयार करने की योजना बनाई जा सकती है। घोड़े का मार्ग वहां पहले से मौजूद है, जिसे साईकलिंग और वाकिंग ट्रेल का रूप दिया जा सकता है। ऊपर नागणी सौर से आगे काईसधार तक 6 किलोमीटर का, इसी प्रकार का ट्रेल बनाया जा सकता है। ऐसे और भी तो बहुत से स्थान होंगे जहां देवस्थल ना हों पर वे पर्यटन के दृष्टिकोण से रमणीय हों। हमारे पास विकल्प अवश्य हैं, बस हमे ढूंढने और ध्यान देने की ज़रूरत है। ज़रूरत है एक सही राजनीतिक इच्छाशक्ति की, बैलेंस्ड डेवलपमेंट की।

जोत और जोगणियां पहाड़ी देवनीति की जीवन रेखा हैं। इसे पर्यटन विकास के नाम पर ना ही छेड़ा जाए तो हम सबके लिए सही रहेगा। वरना इसके दैवीय, सामाजिक, सांस्कृतिक परिणाम क्या होंगे इसका शायद हमारे आधुनिक व पढ़े-लिखे समाज को अंदाज़ा भी नहीं।

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