सुनील राणा

“हर संस्कृति हर सभ्यता तब तक जवाँ है
जुड़े जिसके साथ जब तक नौजवाँ हैं”

लोक संस्कृति किसी भी सभ्यता की जड़ों की तरह है सांस्कृतिक रूप से सम्पन्न लोगों से ही श्रेष्ठ सभ्यता का निर्माण होता आया है लोक संस्कृति हमारी वास्तिवकता को दर्शाती है एक तरह से यूँ भी कह सकते हैं कि लोक संस्कृति हमारा मायना भी है और आईना भी है ,मौखिक साहित्य मूल रूप से लोकसंस्कृति की सरंचना का मुख्य अंग रहा है हमारी लोक संस्कृति हमारा लोक संगीत स्थानीय जनमानस के जीवन को प्रतिविम्बित करता है
समय के साथ हमारे रहन-सहन , लोक संस्कृति , जीवन यापन में बहुत बदलाव आये हैं आज अपनी लोक संस्कृति से विमुख हो रहे लोगों को अपनी समृद्ध एवं संपन्न वास्तिवकता से रूबरू करवाना चुनौती का विषय जरूर है लेकिन कुछ लोग इस चुनौती को स्वीकार करते हुए अपनी लोक संस्कृति ,लोक संगीत को मौजूदा एवं आने वाली पीड़ीयों के लिए सहेज कर रखने के कार्य में लगे हुए हैं
गद्दी समुदाय के युवा वर्ग से ताल्लुक रखते सुनील राणा ने उन परिस्थितियों में लोक गायकी को चुना जब अधिकतर लोग अपनी भाषा बोलने तक से कतरा रहे थे , सुनील राणा का जन्म धर्मशाला के गावं सतोवरी में श्री किशन लाल और श्रीमती कमला देवी के घर 20 दिसम्बर 1979 को हुआ , माता- पिता की लोक संगीत में गहन रूचि होने की बजह से एवं घर में संगीतमय वातावरण होने के कारण बचपन लोक संगीत के सुर तालों पर थिरकते हुए बीता ,
धर्मशाला कालेज से संगीत की शिक्षा प्राप्त की , कालेज के दिनों मिले मंचों ने लोक संगीत की साधना के लिए और प्रोत्साहित किया गुजरे वक़्त को याद करते हुए बकौल सुनील राणा गदियाली भाषी के गीतों की उनकी पहली केसेट प्रड्यूसर ना मिलने पर उन्होंने अपने कुछ मित्रों के सहयोग से निकाली ,आज गद्दी समुदाय के किसी भी समारोह चाहे वो नुआला हो चाहे वो विवाह हो में सुनील राणा के गाये लोकगीत जरूर सुनने को मिलते हैं , गदियाली भाषा में शिव विवाह प्रसंग , गदियाली भाषा में लोक रामायण समृद्ध एवं संपन गद्दी लोकसंस्कृति को दर्शाती हैं
गायन के साथ-साथ गाये जाने वाले शब्दों की समझ इस युवा गायक की गायकी को और ज्यादा भावपूर्ण एवं वास्तविक बना देती है अन्तराष्ट्रीय स्तर के मंच तक अपनी लोक गायकी को पहुंचा चुके सुनील राणा “सांभ” से मुलाकात के दौरान लोक –संगीत, लोक- संस्कृति के बारे में बात करते हुए की गयी कुछ लोक गीतों की व्याख्या उन गीतों को और भी सुंदर एवं आकर्षक बना देती है . जैसे एक लोक-गीत जिसके शब्द अपने आप में इंसान की विभिन्न परिस्थितियों में उत्पन भावों के समेटे हुए हैं
गुडक चमक हो भहुआ मेघा हो
हो बरे राणी चम्ब्याली रे देसा हो
कियां गुड़कूं कियां चमकू हो
अम्बर भरुरा घनै तारे हो
कुथुए दी आई नेरी बादली
कुथुए दा बरसया मेघा हो
छाती ते आई नेरी बादली
दो नैणा दा बरसया मेघा हो
इस गीत में एक बुजुर्ग के भाव हैं जो अपने आप को उपेक्षित महसूस करते हुए अकेले बैठे आँखों में आंसू लिए हुए खुद से सवाल जवाब करता है

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