हिमालय क्षेत्र में पौराणिक जातियां एवं जनजातियां

हिमालय क्षेत्र में पौराणिक जातियों एवं जनजातियों का इतिहास काफी पुराना है जिन्होंने इस क्षेत्र की संस्कृति , धर्म , रीति –रिवाज , खानपान , रहन सहन ,परम्पराओं , लोक-संगीत एवं लोक आस्थाओं को सहेज कर रखा , भौगोलिक दृष्टि से दुर्गम होने के कारण यहाँ की प्राचीन संस्कृति एवं परम्पराएं अपने मौलिक स्वरुप को बनाये रखने में काफी हद तक सफल रही हैं .
गद्धी जनजाति मूल रूप से हिमालय की निवासी रही है इस जनजाति का मूल स्थान हिमाचल प्रदेश के चम्बा जिला का भरमौर (पूर्व में ब्रह्मपुर) रहा है गद्धी बहुल स्थान होने के कारण इसे गद्देरण भी कहा जाता है . भेड़-बकरी पालन गद्धी जनजाति के लोगों की जीवन प्रणाली की अहम् हिस्सा रहा है इसलिए ये लोग भेड़ –बकरियों के चराने के लिए भरमौर से दुसरे स्थानों पर ले जाते थे तथा उन स्थानों को स्थानीय गद्धियाली भाषा में जान्धर कहा जाता है . भरमौर से धौलाधार –पीरपंजाल के बर्फीले पहाड़ों को लांघते हुए लाहौल –स्पीती ,कुल्लू-मंडी , धर्मशाला एवं मैदानी इलाकों पंजाब के होशियारपुर तक भेड़—बकरियां के रेवड़ को चराते हुए बैसाखी को पुनः अपने घर पहुँचते हैं . पहाड़ों को लांघने वाले बहुत से गद्धी लोगों ने समय के साथ –साथ धीर-धीरे पहाड़ों के दोनों ओर अपने घर बना लिए .
धर्मशाला की धौलाधार श्रृंखला में त्रिउंड से ऊपर वाली पहाड़ी पर स्थित आदि कुनाल पत्थरी मंदिर से वापसी पर उतरते वक़्त घरोठ नामक चरगाह में अपनी पत्नी और भेड़ बकरियों के साथ डेरा डाले गद्धी जनजाति से सम्बन्ध रखने वाले बासठ वर्षीय किशन चंद से मुलाक़ात के दौरान इस अर्धघुमंतू जनजाति का पहाड़ों में विषम परिस्थितयों में रहते हुए जीवन-यापन पर प्रकाश डालते कुछ रोचक तथ्यों का पता चला … बकौल किशन चंद अब हमारे बच्चे भेड़ –बकरी पालन से विमुख हो चुके हैं वो अब पहाड़ों पर नहीं आते उनको सेहत खराब करने वाला आरामप्रस्थ आधुनिक जीवन भा गया है वो पहले सेहत खराब करके पैसा कमाते हैं और फिर उस पैसे को सेहत को ठीक करने के लिए खर्चते हैं .हमें देखो हमने पूरा जीवन इन पहाड़ों में बिताया है बासठ वर्ष की उम्र में भी कुदरती सीमित साधनों के साथ चालीस किलो का बोझा उठा कर इन दुर्गम पहाड़ो को लांघता हूँ .. कोई आधुनिक जीवन जीने वाला लांघ के बताये .
हमारी पहाड़ों में विषम परिस्थितियों में जीवन जीने की एक प्रणाली रही है अक्सर हम एक चारागाह में पंद्रह बीस दिन तक रुकते हैं और उस दौरान हम वहां पर विभिन्न प्रकार की फसलें आलू आदि बीज देते हैं तथा विभिन्न प्रकार के रोजमर्रा की जरूरतों का सामान बर्तन आदि कुडों या पत्थर के बंकरों में रख देते हैं ताकि पीछे से आने वाला गद्धी उस सामान को इस्तेमाल कर सके जैसे मैं यहाँ रुका हूँ मैं यहाँ आलू बीज गया मेरे से आगे वाली चरगाह में बैठा गद्धी भी कोई फसल बीज गया होगा इस तरह से जैसे –जैसे हम पहाड़ों को लांघते जाते हैं हमें कोई ना कोई फसल तैयार मिल ही जाती है और वैसे भी इन पहाड़ों में कुदरती रूप से खाने लायक बहुत कुछ है बस आपको पहचान होनी चाहिए …दूध –दहीं –पनीर हमें भेड़ –बकरियों से मिल जाता है बाकि इन पहाड़ों में लुंगडू –फफरू , अलवर (एक तरह का जंगली पालक ), कोदरा , ऐण ,तरडीयाँ भरपूर मात्रा में हैं . यहाँ इन पहाड़ों पर खाने लायक आठ तरह के मशरूम हैं बस पहचान होनी चाहिए .और काला जीरा हम लाहौल वाली तरफ मिल जाता है ,
पहनने के लिए वस्त्र ओड़ने के लिए कम्बल –पट्टू हम भेड़ की ऊंन से तैयार कर लेते हैं पैरों में पहनने के लिए मोचणु या घास से बनी पूलें , आग जलाने के लिए हमारे पास रुणका है … यहाँ कुदरत में पीने लायक कई प्रकार के काह्ड़े – बनखशां एवं मघां हैं
मिठास के लिए शूगर फ्री बूटी है जिसे वैज्ञानिक स्टीबिया कहते हैं , नमक मंडी वाली तरफ गुम्मा के पहाड़ों से मिल जाता है … तो जनाब स्वस्थ जीवन जीने के लिए वो कौन सी चीज है जो कुदरत से हमें नहीं मिलती बाकि तो विलासिता की चीजें हैं जिनके लिए हम कुदरत का सत्यानाश कर रहे हैं
लेकिन बहुत ही दुःख की बात है कि आधुनिक विलासिता के खोखले आकर्षण ने हमारी गद्धी जनजाति को भी प्रभावित किया है …अब हमारे बच्चे सेहत को कायम रखने के लिए जिम जाते हैं सुबह जागिंग करते हैं … थैली वाला या डिब्बे वाला दूध पी रहे हैं …. अब इस आधुनिकता की चकाचौंध से हमारी जीवन प्रणाली भी प्रभावित हुई है अभी उपरोक्त बातें बीते हुए सुनहरे जीवन की तरह लगती हैं

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