इतिहास का ‘नगीना’ , पठियार का ‘लखीना’

टांकरी की जानकारी जुटाते वक़्त काफी समय पहले धर्मशाला के खनियारा स्थित शिलालेख सहित पठियार के इस शिलालेख के बारे राहुल सांकृत्यान के हिमाचल यात्रा संस्मरण में पढा !! जिज्ञासा हुई कि कम से कम अपने आस पास के इतिहास के बारे में कुछ तो जानकारी होनी चाहिए लेकिन हैरानी हुई यह बात जानकर की इन शिलालेखों पर क्या लिखा किसने लिखा , कब लिखा और क्यूँ लिखा स्थानीय लोगों को इस बारे कोई जानकारी नहीं ..
जिला काँगड़ा में नगरोटा बगवां के पास पठियार गावं के टीका टिम्बर हार में लगभग 2200 वर्ष पुराना मौर्यकालीन ब्रह्मी एवं खरोष्ठी लिपि में लिखित शिलालेख (स्थानीय भाषा में लखीना पत्थर) पुरातत्व विभाग के आधीन है राहुल सांकृत्यान ने अपनी हिमाचल यात्रा संस्मरण के अनुसार राहुल अप्रैल 1950-55 के बीच अप्रैल माह में यहाँ इस शिलालेख को देखने आये थे उस वक़्त भी हिमालय के इस सबसे पुराने अभिलेख तक पहुँचने के लिए कोई दिशा सूचक पट्टिका नहीं थी और ना ही आज कोई मार्ग संकेत है ….आज खस्ताहाल सड़कों की धूल फांकते हुए आसानी से इस शिला लेख तक पहुंचा जा सकता है ….आज का पठियार आलू की पैदावार के लिए मशहूर है …खैर हम पूछ-पूछ कर इस अभिलेख तक पहुंचे ..जानी–पहचानी और सब जगहों के लिए एक जैसी पंक्तियाँ लिए हुए पुरातत्व विभाग का वोर्ड लगा था जिसमें अमूमन यही लिखा होता है कि “यह स्मारक प्राचीन स्मारक एवं पुरातात्विक स्थल व् अवशेष अधिनियम 1958 (1958 के 24 ) के अंतर्गत राष्ट्रीय महत्त्व का घोषित किया गया है इसके आसपास सौ /दो सौ मीटर तक कोई निर्माण करना वर्जित है” लेकिन इस स्थल के बिलकुल साथ नियमों –अधिनियमों की धज्जियां उडती दिखती हैं ..खैर स्थानीय लोगों की मान्यता है की यह एक विस्मयकारी लिपि है और इसे कोई नहीं समझ पाया है जबकि ब्रह्मी तथा खरोष्ठी आसानी से पढी जा सकती है … चारों तरफ पुरातत्व विभाग दुआरा लगायी ग्रिल के अंदर ज़मीन पर उभरी इस शिला पर खुदे शब्दों को लगभग 2250 वर्ष पहले “रठिदर वायुल” ने ज्यादातर भारतीय लिपियों की जननी ब्राह्मी लिपि में “वायुलस पुकरिणी” तथा इसके समकालीन उर्दू की तरह दायें से बायें लिखी जाने वाली खरोष्ठी लिपि में “राठिदारासा वयुलस पुकरिणी” लिखवाया था ..
राहुल सांकृत्यान के अनुसार वायुल कोई साधारण गृहस्थ नहीं रहा होगा उसने अपने नाम के पहले “रठिदर ” भी लगाया था ,वो अवश्य तत्कालीन “पठियार का ग्रामीण (लम्बरदार) या कोई और सम्मानित पुरुष रहा होगा , हो सकता है “रठिदर” शब्द उसके पद को बतलाता हो ,रठ या राष्ट्र उस समय प्रदेश या जनपद को कहते थे , जिस कारण एक प्रदेश का नाम महाराष्ट्र पड़ा , रठ के अधिकारी को रठिक कहते थे , हो सकता है रठिक के लिए यहाँ रठिदर (राष्ट्रधर) कहा गया , वैसे चम्बा और काँगड़ा में राठी एक बहुसंख्यक और प्रभावशाली जाति है , जिस पुष्करणी को बनवाने का उल्लेख इस अभिलेख में है आज वह कहीं नहीं दिखाई देती ,बाईस सौ साल बाद आज वायुल की पुष्करिणी का कैसे पता लग सकता है वायुल ने इस पुष्करिणी को जनसाधारण के उपयोग के लिए बनाया था , यदि उसके साथ भिक्षु –विहार रहा होता तो उसका उल्लेख जरूर होना चाहिए था पर इसमें संदेह कम है कि कांगड़ा की इस विशाल उपत्यका में अशोक के समय बौधधर्म का प्रचार अवश्य हुआ होगा …वायुल के साथ लगा हुआ विशेषण “रठिदरस” राठी है रथी है या कुछ और है ,
वोगेल (1902-03) ने राठी जाति को काँगड़ा की एक कृषक जाति बताया है और राठी को रथी या सारथी के सामान आँका है ,इस शिला में दो पंक्तियाँ हैं उपरी पंक्ति ब्राह्मी लिपि में है जो आज की देवनागरी एवं अंग्रेजी की तरह बायें से दायें लिखी जाती थी …ब्राह्मी लिपि में लिखी गयी पंक्ति में दो शब्द “वायुलस पुकरिणी” तथा अंत में एक स्वस्तिक चिन्ह और एक पद चिन्ह (पैर का निशान) नज़र आता है निचली पंक्ति उर्दू की तरह लिखी जाने वाली लिपि खरोष्ठी में लिखी गयी है जिसमें तीन शब्द “राठिदारासा वयुलस पुकिरिणी” लिखा नज़र आता है वैसे एतिहासिक धरोहरों के उन अधिकारिक सरक्ष्कों जिन्होंने एक दिशासूचक बोर्ड तक नहीं लगाने की ज़हमत नहीं उठायी उनसे यह उम्मीद करना की वो इस शिलालेख के अनुवाद की पट्टिका इस स्थान पर लगा देंगे किसी भी तरह से तर्कसंगत नहीं होगा …
ब्राह्मी लिपि एक प्राचीन लिपि है जिससे कई एशियाई लिपियों का विकास हुआ है। प्राचीन ब्राह्मी लिपि के उत्कृष्ट उदाहरण सम्राट अशोक द्वारा ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में बनवाये गये शिलालेखों के रूप में अनेक स्थानों पर मिलते हैं। नये अनुसंधानों के आधार 6 वीं शताब्दी ईसा पूर्व के लेख भी मिले है
अशोक ने अपने लेखों की ब्राह्मी लिपि को ‘धम्मलिपि’ का नाम दिया है; लेकिन बौध, जैन और ब्राह्मण ग्रंथों के अनेक उल्लेखों से ज्ञात होता है कि इस लिपि का नाम ‘ब्राह्मी’ लिपि ही रहा होगा।
सिंधु घाटी की चित्रलिपि को छोड़ कर, खरोष्ठी भारत की दो प्राचीनतम लिपियों में से एक है। यह दाएँ से बाएँ को लिखी जाती थी।सम्राट अशोक ने शाहबाजगढ़ी और मनसेहरा के अभिलेख खरोष्ठी लिपि में ही लिखवाए हैं इस देश में यह उत्तरपश्चिम से आई और कुछ काल तक, अशोक के अतिरिक्त, मात्र विदेशी राजकुलों द्वारा उनके ही प्रभाव के क्षेत्र में प्रयुक्त होकर उनके साथ ही समाप्त हो गई।
खरोष्ठी के प्राचीनतम लेख तक्षशिला और चार (पुष्कलावती) के आसपास से मिले हैं, किंतु इसका मुख्य क्षेत्र उत्तरी पश्चिमी भारत एवं पूर्वी अफगानिस्तान था। मथुरा से भी कुछ खरोष्ठी अभिलेख प्राप्त हुए हैं। इनके अतिरिक्त दक्षिण भारत, उज्जैन तथा मैसूर के सिद्दापुर से भी खरोष्ठी में लिखे स्फुट अक्षर या शब्द मिले हैं। मुख्य सीमा के उत्तर एवं उत्तर पूर्वी प्रदेशों से भी खरोष्ठी लेखोंवाले सिक्के, मूर्तियाँ तथा खरोष्ठी में लिखे हुए प्राचीन ग्रंथ उपलब्ध हुए हैं। ई. पू. की चौथी, तीसरी शताब्दी से ईसा की तीसरी शताब्दी तक उत्तरपश्चिम भारत में मथुरा तक खरोष्ठी का प्रचलन रहा। कुषाणयुग के बाद इस लिपि का भारत से बाहर चीनी तुर्किस्तान में प्रवेश हुआ और कम से कम एक शताब्दी वह वहाँ जीवित रही।
खरोष्ठी लिपि में प्रत्येक व्यंजन में अ का मौजूद रहना , लम्बे स्वरों तथा स्वरमात्राओं का अभाव, अन्य स्वरमात्राओं का ऋजुदंडों द्वारा व्यक्तीकरण, व्यंजनों के पूर्व पंचम वर्णों के लिए सवंत्र अनुस्वार का प्रयोग तथा संयुक्ताक्षरों की कमी खरोष्ठी लिपि की कुछ मुख्या विशेषताएँ हैं

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